Friday, March 26, 2010

गज़ल

डाल से टूट कर जो बिखर जाएँगे
फिर ये पत्ते जाने किधर जाएँगे

कौन अपना है अब, किसके घर जाएँगे
हम मुसाफ़िर जाने किघर जाएँगे


हम तो पत्थर हैं क्या अपनी औकात है
तू सँवारेगा तो हम सँवर जाएँगे

है मुकद्दर में भटकन, भटकते हैं हम
होगा तक़दीर में तो ठहर जाएँगे

एक तेरे सिवा और मँज़िल नहीं
लौटना ही पड़ेगा जिधर जाएँगे

मेरी राहें बहुत हैं कठिन देखिए
कौन से मोड़ तक हमसफ़र जाएँगे

वो नकाब अपना उलटेंगे कुछ देर में
वो नज़ारा भी हम देखकर जाएँगे







रवि कांत 'अनमोल'

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