Sunday, August 29, 2010

ग़ज़ल :मेरे अंदर कहीं कुछ टूटता है

मेरा दम मेरे अंदर घुट रहा है
कहाँ है जो दरीचे खोलता है

हमेशा आइनों से झाँकता है
न जाने क्या वो मुझसे चाहता है

वो अपनी हर नज़र से हर अदा से
हज़ारों राज़ मुझपे खोलता है

मैं जितना इस जहाँ को देखता हूँ
मेरे अंदर कहीं कुछ टूटता है

जवाब उनके नहीं मिलते कहीं से
सवाल ऐसे मेरा दिल पूछता है

मैं शायद ख़ुद को खो के तुम को पा लूँ
मगर इतना कहाँ अब हौसला है

मैं पल पल सुन रहा हूँ बात उसकी
मेरे कानों में कोई बोलता है


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रवि कांत 'अनमोल'
मेरी कविता
http://aazaadnazm.blogspot.com
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2 comments:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

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  2. मैं जितना इस जहाँ को देखता हूँ
    मेरे अंदर कहीं कुछ टूटता है

    जवाब उनके नहीं मिलते कहीं से
    सवाल ऐसे मेरा दिल पूछता है ।
    बढिया शेर ।

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