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Monday, October 20, 2014
Thursday, October 16, 2014
ग़ज़ल: हम अपने दिल को भी समझा न पाए
मेरे ग़ज़ल संग्रह टहलते-टहलते में से एक ग़ज़ल
जो शिकवे थे लबों तक आ न पाए
हम अपने दिल को भी समझा न पाए
मिला था प्यार भी लेकिन म़कद्दर
उसे जब वक्त था अपना न पाए
करें क्या ज़िक्र अब उस दास्तां का
जिसे अंजाम तक पहुंचा न पाए
तुम्हारी रहनुमाई थी कि मुझको
वो उलझे रास्ते भटका न पाए
मुक़द्दर पर चला है ज़ोर किसका
कि मंज़िल सामने थी, जा न पाए
जो करना है अभी अनमोल कर लो
कि अगली सांस शायद आ न पाए
Wednesday, October 15, 2014
ग़ज़ल : ये हसीं पल कहाँ से लाओगे
मेरे ग़ज़ल संग्रह टहलते-टहलते में से एक ग़ज़ल

वक़्त ये कल कहाँ से लाओगे
भीग लो मस्तियों की बारिश में
फिर ये बादल कहाँ से लाओगे
ज़िंदग़ी धूप बन के चमकेगी
माँ का आंचल कहाँ से लाओगे
वक़्त के हाथ बेचकर सांसें
ज़िंदगी कल कहाँ से लाओगे
जब जवानी निकल गई प्यारे
दिल ये पागल कहाँ से लाओगे
ज़िंदगी बन गई सवाल अगर
इसका तुम हल कहाँ से लाओगे
नर्म ये घास जिस पे चलते हो
कल ये मख़मल कहाँ से लाओगे
ये मधुर गीत बहते पानी का
कल ये क़लक़ल कहाँ से लाओगे
ये शिकारे ये दिलनशीं मंज़र
और यह डल कहाँ से लाओगे
अट गई जब ज़मीन महलों से
दाल चावल कहाँ से लाओगे
बाग़ जब कट गए तो ऐ अनमोल
ये मधुर फल कहाँ से लाओगे
गज़ल- आइए ज़िन्दगी की बात करें
मेरे ग़ज़ल संग्रह टहलते-टहलते में से एक ग़ज़ल
प्यार की दोस्ती की बात करें
आइए ज़िन्दगी की बात करें
कोई हासिल नहीं है जब इसका
किस लिए दुश्मनी की बात करें
ज़िक्र हो तेरी अक़्लो-दानिश का
मेरी दीवानगी की बात करें
आप नज़दीक जब नहीं तो फिर
किस से हम अपने जी की बात करें
बीती बातों में कुछ नहीं रक्खा
बैठिए हम अभी की बात करें
बात कुछ आपकी हो मेरी हो
और हम क्यूं किसी की बात करें
ग़ज़ल-वो प्यार ख़ुद को गंवा कर तलाश करना है
मेरे ग़ज़ल संग्रह टहलते-टहलते में से एक ग़ज़ल
तुम्हीं को रूह के अंदर तलाश करना है
तुम्हीं को जिस्म के बाहर तलाश करना है
जो प्यार ख़ुद को भुलाने की वज्ह बन जाए
वो प्यार ख़ुद को गंवा कर तलाश करना है
तलाश किसकी है मेरी उदास आँखों को
न जाने कौन सा मंज़र तलाश करना है
तू जिस मक़ाम पे भी है उसे समझ आग़ाज़
मक़ाम और भी बेहतर तलाश करना है
जहां से बे-ख़ुदी मुझको ज़रा सी मिल जाए
अभी तो ऐसा कोई दर तलाश करना है
वो झूमती हुई मुझको सुराहियाँ तो मिलें
वो नाचता हुआ साग़र तलाश करना है
तुम्हारे वास्ते जैसे भटकता हूँ अब मैं
तुम्हें भी कल मुझे खो कर तलाश करना है
मैं तेरे दर को ही अक्सर तलाश करता हूँ
मिरा तो काम तिरा दर तलाश करना है
तुम्हीं हो रास्ता 'अनमोल' तुम ही मंज़िल हो
डगर डगर तुम्हें दर-दर तलाश करना है
तुम्हीं को रूह के अंदर तलाश करना है
तुम्हीं को जिस्म के बाहर तलाश करना है
जो प्यार ख़ुद को भुलाने की वज्ह बन जाए
वो प्यार ख़ुद को गंवा कर तलाश करना है
तलाश किसकी है मेरी उदास आँखों को
न जाने कौन सा मंज़र तलाश करना है
तू जिस मक़ाम पे भी है उसे समझ आग़ाज़
मक़ाम और भी बेहतर तलाश करना है
जहां से बे-ख़ुदी मुझको ज़रा सी मिल जाए
अभी तो ऐसा कोई दर तलाश करना है
वो झूमती हुई मुझको सुराहियाँ तो मिलें
वो नाचता हुआ साग़र तलाश करना है
तुम्हारे वास्ते जैसे भटकता हूँ अब मैं
तुम्हें भी कल मुझे खो कर तलाश करना है
मैं तेरे दर को ही अक्सर तलाश करता हूँ
मिरा तो काम तिरा दर तलाश करना है
तुम्हीं हो रास्ता 'अनमोल' तुम ही मंज़िल हो
डगर डगर तुम्हें दर-दर तलाश करना है
Tuesday, October 7, 2014
पंजाबी ग़ज़ल
आज मेरी एक पुरानी पंजाबी ग़ज़ल
ਖਬਰੇ ਕਿੰਨੇ ਚੰਨ ਤੇ ਸੂਰਜ ਖਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਉੱਡਦੇ ਪੰਛੀ ਅੰਬਰੋਂ ਹੇਠਾਂ ਲਾਹ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਰੱਬ ਹੀ ਜਾਨੇ ਕੈਸੀ ਨੇਹ੍ਰੀ ਝੁੱਲੀ ਹੈ ਇਸ ਦੁਨੀਆ ਤੇ
ਸ਼ੇਰ ਬਹਾਦਰ ਕਿੰਨੇ ਮਾਰ ਮੁਕਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਮਾਪਿਆਂ ਕੋਲੋਂ ਪੁੱਤ ਖੋਹ ਲੀਤੇ ਭੈਣਾ ਕੋਲੋਂ ਵੀਰ ਗਏ
ਬੱਚਿਆਂ ਕੋਲੋਂ ਬਾਪ ਦੇ ਹੱਥ ਛੁਡਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਕਿੰਨੀਆਂ ਨਾਰਾਂ ਡੀਕਦੀਆਂ ਨੇ ਬੈਠੀਆਂ ਸਿਰ ਦੇ ਸਾਈਂ ਨੂੰ
ਕਿੰਨੇ ਮਾਹੀਂ ਅਪਣੀ ਰਾਹ ਚਲਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਖਾਧ ਖੁਰਾਕਾਂ ਖਾ ਕੇ ਜੋ 'ਅਨਮੋਲ' ਬਨਾਉਂਦੇ ਸਨ ਜੁੱਸੇ
ਕਿੰਨੇ ਗਭਰੂ ਟਾਹਣਾਂ ਵਰਗੇ ਢਾਹ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਰਵੀ ਕਾਂਤ ਅਨਮੋਲ
ਖਬਰੇ ਕਿੰਨੇ ਚੰਨ ਤੇ ਸੂਰਜ ਖਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਉੱਡਦੇ ਪੰਛੀ ਅੰਬਰੋਂ ਹੇਠਾਂ ਲਾਹ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਰੱਬ ਹੀ ਜਾਨੇ ਕੈਸੀ ਨੇਹ੍ਰੀ ਝੁੱਲੀ ਹੈ ਇਸ ਦੁਨੀਆ ਤੇ
ਸ਼ੇਰ ਬਹਾਦਰ ਕਿੰਨੇ ਮਾਰ ਮੁਕਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਮਾਪਿਆਂ ਕੋਲੋਂ ਪੁੱਤ ਖੋਹ ਲੀਤੇ ਭੈਣਾ ਕੋਲੋਂ ਵੀਰ ਗਏ
ਬੱਚਿਆਂ ਕੋਲੋਂ ਬਾਪ ਦੇ ਹੱਥ ਛੁਡਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਕਿੰਨੀਆਂ ਨਾਰਾਂ ਡੀਕਦੀਆਂ ਨੇ ਬੈਠੀਆਂ ਸਿਰ ਦੇ ਸਾਈਂ ਨੂੰ
ਕਿੰਨੇ ਮਾਹੀਂ ਅਪਣੀ ਰਾਹ ਚਲਾ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਖਾਧ ਖੁਰਾਕਾਂ ਖਾ ਕੇ ਜੋ 'ਅਨਮੋਲ' ਬਨਾਉਂਦੇ ਸਨ ਜੁੱਸੇ
ਕਿੰਨੇ ਗਭਰੂ ਟਾਹਣਾਂ ਵਰਗੇ ਢਾਹ ਲਏ ਇਹਨਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਨੇ
ਰਵੀ ਕਾਂਤ ਅਨਮੋਲ
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